मसूरी। मसूरी ट्रेडर्स एंड वेलफेयर एसोसिएशन ने छावनी परिषद लंढौर कार्यालय जाकर लंढौर छावनी का नाम बदले के प्रस्ताव का विरोध किया व आपत्ति दर्ज की तथा कहा कि जनहित में लंढौर छावनी का नाम न बदलें व इसके पुराने अस्तित्व को बनाये रखें।
लंढौर छावनी परिषद दो शदाब्दी से अधिक के समृद्ध इतिहास के साथ, महज एक नाम नहीं बल्कि इस क्षेत्र की पहचान, संस्कृति और विरासत का प्रतीक है। जैसा कि सभी जानते हैं, कि वर्तमान नाम को बनाए रखने के लिए मजबूत ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामुदायिक कारण हैं। यह भी समझा जाता है कि लंढौर नाम केवल औपनिवेशिक मूल का नहीं है और इसका संबंध रुड़की के पास स्थित लंढैरा जैसी स्थानीय जड़ों से हो सकता है। इसके अलावा, लंढौर में एक सदी से अधिक पुराने संस्थान हैं, जिनसे हजारों पूर्व छात्र, कर्मचारी और परिवारो गहरा नाता रहा है। मसूरी के कई लोगों के लिए, यह महज एक जगह नहीं, बल्कि जीवन भर का जुड़ाव और यादों से भरा क्षेत्र व घर है। ऐसे समय में जब हमारा ध्यान पहाड़ों के संरक्षण और नाजुक पर्यावरण की रक्षा पर होना चाहिए, वहीं लंढौर के ऐतिहासिक स्थान का नाम बदलना अनावश्यक और दुर्भाग्यपूर्ण प्रतीत होता है। प्रकाशित सार्वजनिक सूचना के अनुसार, मसूरी ट्रेडर्स एंड वेलफेयर एसोसिएशन के सदस्य, लंढौर का नाम न बदलने के पक्ष में है जो नया नाम दिया जा रहा है उसका मसूरी से कोई संबध नहीं है। छावनी परिषद की सीईओ से मांग की गयी कि लंढौर का नाम न बदलें व जनभावना को देखते हुए जन भावना का सम्मान करें। ज्ञापन में कहा गया कि जो आपत्ति दी जा रही है उसमें किसी जगह का नाम बदलने में आधिकारिक साइनबोर्ड, राजमार्ग बोर्ड, नक्शे बदलने और सरकारी रिकॉर्ड को अपडेट करने के लिए भारी खर्च शामिल होता है, जिसे सार्वजनिक धन की अनावश्यक बर्बादी के रूप में देखा जा सकता है। नाम बदलनले से प्रशासनिक उलझन के साथ ही असुविधा होगी नाम बदलने से निवासियों, आगंतुकों और डाक सेवाओं के लिए दीर्घकालिक भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। निजी व्यवसायों को ब्रांडिंग, वेबसाइटों और कानूनी दस्तावेजों को अपडेट करने में महत्वपूर्ण प्रशासनिक बोझ का सामना करना पड़ता है। नाम बदलने से इतिहास के मिटने का भय भी है। नाम बदलने से स्थानीय स्मृति, संस्कृति, भूगोल या ऐतिहासिक घटनाओं से भी नाता टूट जाता है। नाम बदलने से वास्तविक नागरिक मुद्दों को संबोधित करने के बजाय स्थानीय आपसी प्रेम भाव को लक्षित करते हैं। लोकप्रिय पर्यटन स्थलों या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त लंढौर मसूरी के लिए, नाम बदलने से ब्रांड मूल्य नष्ट हो सकता है और पर्यटन पर निर्भर व्यवसायों को नुकसान पहुंच सकता है। परिचित नामों को बदलना उचित नहीं है, क्योंकि इससे भावनात्मक और सांस्कृतिक प्रतिरोध उत्पन्न हो सकता है। स्थानीय निवासियों से पर्याप्त परामर्श या राय लिए बिना नाम बदलने का निर्णय लेने पर अक्सर आपत्तियां उठाई जाती हैं, जो की हमारे द्वारा और क्षेत्र के हजारों नागरिकों द्वारा किया जा रहा है। इस मौके पर मसूरी ट्रेडर्स एंड वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष रजत अग्रवाल, महामंत्री जगजीत कुकरेजा, कोषाध्यक्ष नागेंद्र उनियाल, उपाध्यक्ष अतुल अग्रवाल, संयुक्त सचिव सलीम अहमद, मनोज अग्रवाल, राजकुमार, अंनत प्रकाश, परमजीत कोहली, सुनील पंवार, राजेश शर्मा आदि थे।
वहीं दूसरी ओर पूर्व पालिकाध्यक्ष अनुज गुप्ता ने भी एेंतिहासिक लंढौर छावनी का नाम बदलने का विरोध किया व मुख्य छावनी अधिशासी अधिकारी को ज्ञापन प्रेषित किया व मांग की गयी कि लंढौर छावनी का नाम न बदला जाय। ज्ञापन में कहा गया है कि लंढौर क्षेत्र का नाम वर्तमान में केवल एक पहचान नहीं बल्कि क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत, सांस्कृतिक परंपरा और स्थानीय जनता की भावनाओं का प्रतीक है। बिना व्यापक जन सहमति और बिना ठोस आधार के इस प्रकार का निर्णय अनुचित है व लोकतात्रिंक मूल्यों के भी विपरीत है। मांग की गयी कि इस मामले को गंभीरता से लेते हुए छावनी परिषद लंढौर का नाम न बदला जाय। वहीं इस संबंध में होटल एसोसिएशन के अध्यक्ष संजय अग्रवाल व सचिव अजय भार्गव ने भी छावनी परिषद को पत्र भेज कर इसका नाम न बदलने का अनुरोध किया है व कहा कि इससे इसका अस्तित्व, संस्कृति व इतिहास समाप्त हो जायेगा जबकि वर्तमान में लंढौर पूरे देश ही नहीं विश्व में अपनी अलग पहचान बना चुका है।
