विद्यामंदिर में वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर सामूहिक गान किया गया।

उत्तराखण्ड देहरादून/मसूरी

मसूरी। वंदे मातरम के 150 के ऐतिहासिक एवं गौरवपूर्ण 150 वर्ष पूरे होने पर विद्या भारती उत्तराखंड के तत्वाधान में महात्मा योगेश्वर सरस्वती शिशु मंदिर इंटर कालेज के सभागार में वंदे मातरम का सामूहिक गान किया गया। जो माृत भूमि के प्रति श्रद्धा, सम्मान और राष्ट्रभावना को अभिव्यक्त करने के लिए समर्पित किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन से किया गया व प्रधानाचार्य डा. मनोज रयाल ने सभी का स्वागत करते हुए नमामि भारतम वंदेमातरम गी एक कार्यक्रम नहीं बल्कि मातृभूमि के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और स्वतंत्रता संग्राम की विरासत को नई पीढी तक पहुचाने का राष्ट्रव्यापी जनसहभागिता अभियान है। इसके माध्यम से यह संदेश दिया जा रहा है कि राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमा का नाम नहीं है बल्कि इतिहास, संस्कृति, परंपरा, त्याग व संघर्ष व करोडो देशवासियों की सामूहिक चेतना से निर्मित एक जीवंत भाग है। इस मौके पर बतौर मुख्य वक्ता लेखिका एवं विचारक निधि बहुगुणा ने विस्तार से बताते हुए कहा कि आजादी से पहले हमारे देश में अंग्रेजो का शासन था व देश के अनेक हिस्सों में आजादी का आंदोलन चल रहा था। तब वंकिमचद्र ने वंदे मातरम गीत लिखा 1875 में 7 नवंबर को उन्होंने अपनी पत्रिका वंग दर्शन में प्रकाशित किया। उस समय भारत में शिक्षा बदल दी गयी थी व मेकाले की शिक्षा प्रणाली लागू हो गयी थी। तब उनकी यह कविता पूरे भारत में फैली व 1888 में वंकिम चंद्र ने एक उपन्यास आनंदमठ में लिखा। 1896 में रवीद्रनाथ टैगोर ने इस गीत को संगीत दिया जो कोलकाता में कांग्रेस के सम्मेलन में गाया गया व पूरे देश में फेला। 1905 में स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ व उसका प्रमुख नारा वंदे मातरम बना।

जिसे अंग्रेजों ने प्रतिबंधित कर दिया व अंग्रेज इस गाने से डरने लगे थे व बाद में यह देश की आजादी का गीत बना व देश आजाद हुआ। उन्हांेने कहा कि वंदेमातरम भारत का राष्ट्रीय गीत है जिसने स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हमें अपनी भाषा संस्कृति, पहनावा अपनाना चाहिए व सामाजिक समरसता के साथ पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान देना चाहिए। इस मौके पर रिटायर्ड कर्नल सुनील गुप्ता ने कहा कि वंदे मातरम बडे सोच विचार के बाद बना उस समय देश गुलाम था व बाद में वंदे मातरम के माध्यम से देश को आजाद करवाया। उसका एक एक शब्द एक एक छंद बड़ा महत्वपूर्ण है। इसका प्रचार प्रसार आवश्यक है उसी से हमें प्रेरणा मिलेगी। हम भारत वर्ष व आर्यवृत के निवासी है जो पहले पाकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, सोमालिया, बाली, बांग्लादेश, श्रीलंका, सुमात्रा मध्य एशिया है जहां आज भी प्रमाण हैं। जब हम जानेगे कि हम क्या थे। अपनी प्राचीन सभ्यता को आने वाली पीढी के सामने लाना है। जो इसका विरोध करते है वह सात सौ वर्ष पुराने है जबकि हम सनातन है, वो लोग इसकी कल्पना नहीं कर सकते। इस मौके पर पालिकाध्यक्ष मीरा सकलानी ने बतौर मुख्य अतिथि कहा कि वदें मातरम गायन का सामूहिक गायन हमारी पंरपरा व संस्कृति थी जिसे कुचला जा रहा था। उस समय देश को एकसूत्र में पिरोने के लिए वंदे मातरम गीत बनाया गया व 24जनवरी 1950 को संविधान सभा ने राष्ट्रीय गीत की मान्यता दी तब भी देश को आजाद कराने में योगदान दिया व आज भी देश को एक सूत्र में बांधने के लिए यह जरूरी है। आज पूरे देश में पूरा गीत सामूहिक रूप से गाया जा रहा है व पूरा गीत मौखिक याद रहे। इस मौके पर नगर पालिका अधिशासी अधिकारी रजनीश डोबरियाल, शैलेंद्र कर्णवाल, मदनमोहन शर्मा, शरद गुप्ता, रजत अग्रवाल आदि मौजूद रहे।