बसंत पंचमी का पर्व धार्मिक मान्यताआें पूजा अर्चना के साथ मनाया गया।

उत्तराखंड देहरादून/मसूरी

मसूरी। पहाड़ों की रानी मसूरी में बसंत पंचमी का पर्व पूरे धार्मिक रीति रिवाज व पारंपरिक मान्यताओं के साथ मनाया गया। इस मौके पर लोगों ने घरों में मां सरस्वती की पूजा अर्चना की वहीं मदिरों में भी पूजा अर्चना के साथ प्रसाद का वितरण किया गया।
बसंत पंचमी का पर्व जहां बसंत के आने पर मनाया जाता है वहीं इसका धार्मिक महत्व भी है। इस दिन मां सरस्वती का पदार्पण हुआ था। इस दिन को बसंत ऋतु की आगमन का प्रतीक भी माना जाता है। इस दिन लोग सरस्वती पूजन करते हैं और व्रत रखते हैं। हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से ये एक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बसंत पंचमी श्री पंचमी के दिन माता सरस्वती का अवतरण हुआ था। इसीलिए हर वर्ष माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को बसंत पंचमी का त्योहार मनाया जाता है। मान्यताओं के अनुसार, ब्रह्माजी ने जब संसार का भ्रमण करते हुए यह महसूस किया कि हर दिशा मूक है, हर जगह खामोशी छाई हुए है तो उन्होंने अपने कमंडल से जल निकालकर छिड़का। इसके बाद एक ज्योतिपुंज से एक देवी का प्राकाट्य हुआ जिनका चेहरा तेजस्वी था और हाथों में वीणा थी, इस देवी का नाम ब्रह्माजी ने सरस्वती दिया। बसंत पंचमी के दिन ही मां सरस्वती प्रकट हुई थी इसलिए आज भी माघ शुक्ल पंचमी के दिन उनकी पूजा की जाती है। बसंत पंचमी पर मां सरस्वती की पूजा करने से भक्तों को ज्ञान और विवेक की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही जो लोग गायन, वादन, अभिनय आदि के क्षेत्र में हैं उनको भी मां सरस्वती की पूजा करने से लाभ प्राप्त होते हैं। इसके साथ ही आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति भी मां सरस्वती की पूजा करने से होती है। पर्व को मनाने के लिए मंदिरों में मां सरस्वती की पूजा करने के बाद प्रसाद वितरित किया गया। वहीं ग्रामीण क्षेत्रा में पंचमी के दिन से खेती का कार्य शुरू होता है, व ग्रामीण पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ खेत में जाते हैं व पूजा अर्चना के बाद खेत जोतना शुरू करते है। इस दिन बैलों के सीगां पर तेल लगाया जाता है व उन्हें घी पिलाया जाता है।